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जशपुर की पहचान बने चाय के बागान, दार्जिलिंग की चाय से बेहतर क्वालिटी, प्रोसेसिंग यूनिट में उत्पादन शुरू

 

सीजी न्यूज रिपोर्टर

अब तक राज्य के जशपुर की पहचान यहां की विशिष्ट संस्कृति, समकालीन राजाओं के इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता के रूप में होती रही है। अब इन विशिष्टताओं में चाय बागान भी जुड़ गए हैं। जशपुर में अब पर्वतीय और ठंडे इलाकों में पनपने वाले चाय के पौधों की खेती शुरू हो गई है। यहां चाय के बागान विकसित हो चुके हैं। यहां के चाय बागान न सिर्फ छत्तीसगढ़वासियों को, बल्कि दूसरे राज्यों के पर्यटकों को भी आकर्षित करेंगे। चाय प्रोसेसिंग यूनिट में उत्पादन शुरू हो गया है।

जशपुर के चाय के बागान की खासियत यह है कि दूसरे राज्यों में चाय के उत्पादन के लिए रासायनिक कीटनाशकों और खाद का इस्तेमाल होता है, वहीं जशपुर के चाय बागान में जैविक खाद का उपयोग किया जाता है। जैविक खाद से तैयार पौधे और चाय न सिर्फ चाय पीने वालों की सेहत को तंदुरूस्त रखंेगे, बल्कि चाय की चुस्की के साथ ताजगी और स्वाद का भी आनंद देंगे। जशपुर जिले के बालाछापर में चाय प्रसंस्करण केंद्र में उत्पादन शुरू हो गया है। यहां ब्लैक और ग्रीन टी तैयार किया जा रहा है।
45 लाख की लागत से स्थापित हुआ प्रसंस्करण केंद्र
बालाछापर में वनविभाग के पर्यावरण रोपणी परिसर में चाय प्रसंस्करण यूनिट की स्थापना की गई है। लगभग 45 लाख रूपए की लागत से स्थापित यूनिट में प्रतिदिन 1200 किलोग्राम हरे पत्ते की प्रोसेसिंग क्षमता है। इससे 250 किलोग्राम चाय का उत्पादन प्रतिदिन किया जा सकता है। वन विभाग के एसडीओ एसके गुप्ता ने बताया कि पांच किलो चाय के हरे पत्ते से एक किलो चायपत्ती बनती है।
दार्जिलिंग के प्रशिक्षित बीरबहादुर सुब्बा कर रहे सहयोग
चाय प्रसंस्करण यूनिट की स्थापना के बाद मशीन संचालन की जिम्मेदारी दार्जिलिंग के बीरबहादुर सुब्बा को सौंपी गई है। सुब्बा को 40 साल का चाय उत्पादन का अनुभव है और वे चाय कंपनी से रिटायर्ड हो चुके हैं। उनके माध्यम से जशपुर जिले के युवाओं को मशीन संचालन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यहां की चाय बिलासपुर, रायपुर, अंबिकापुर, दुर्ग सहित अन्य जिलों में वन विभाग के संजीवनी केंद्रो में बिक्री के लिए उपलब्ध है।
20 एकड़ में फेैला है सारूडीह चाय का बागान
पर्वतीय प्रदेशों के शिमला, दार्जिलिंग, उंटी, असम, मेघालय सहित अन्य राज्यों की चाय बागानों की तरह जशपुर के ग्राम सारूडीह का चाय बागान पर्वत और जंगल से लगा हुआ है। यह लगभग 20 एकड़ क्षेत्र में फैला है। कुल 18 हितग्राहियों के खेत में चाय के पौधे लगाए गए हैं। यहां की चाय को विशेषज्ञों ने दार्जिंलिंग की चाय से बेहतर क्वालिटी का माना है। अब वन विभाग ने केसरा मनोरा में 30 एकड़ और गुटरी, लोखंडी 20 एकड़ में चाय बागान लगाने की तैयारी की है। फिलहाल चाय के 3 लाख पौधे बालाछापर नर्सरी में तैयार हैं। इसमें से 2 लाख पौधों को इस साल लगाया जाएगा। जशपुर के सोगड़ा आश्रम परिसर में भी लगभग 8 एकड़ में चाय का बागान है।

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