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जब सवाल पूछना अपराध होने लगे तो लोकतंत्र की जड़ें खोखली होने लगती है – मुख्यमंत्री

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भिलाई में आयोजित 19 वें वसुंधरा सम्मान से सम्मान किया है। वरिष्ठ पत्रकार तुषार कांति बोस को मिला वसुंधरा सम्मान

 

सीजी न्यूज रिपोर्टर

भयमुक्त वातावरण में प्रश्न पूछने का अधिकार ही असली लोकतंत्र है। प्रश्न पूछना भारतीय परंपरा का हिस्सा है। वेदों में, उपनिषदों में भारतीय मनीषा में प्रश्न पूछने की परंपरा रही है। लोकतंत्र भी प्रश्न पूछने से ही मजबूत होता है। जिन प्रश्नों को उठाने पर संविधान मजबूत होता है उसे भयमुक्त होकर जरूर पूछा जाना चाहिए। ये विचार मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने व्यक्त किए। भिलाई में स्व. देवीप्रसाद चौबे की स्मृति में वसुंधरा सम्मान समारोह में भूपेश ने आगे कहा कि जब सवाल पूछना अपराध होने लगता है तो लोकतंत्र की जड़ें खोखली होने लगती है।

सीएम ने कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार तुषार कांति बोस को वसुंधरा सम्मान से सम्मानित करते हुए कहा कि बोस का पत्रकारिता जीवन सीमित संसाधनों के साथ चला। कठिन दौर में भी उन्होंने अपनी कलम को जीवित रखा, जो प्रशंसनीय उपलब्धि है। मुख्यमंत्री ने कहा कि डरा हुआ समाज अपनी नींव से विचलित हो जाता है। हमारी परंपरा हमें निर्भय बनाती है। ज्ञान हमारे भय को समाप्त करता है।

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सीएम ने कहा कि आज स्व. देवीप्रसाद चौबे की स्मृति में यह आयोजन हो रहा है। स्व. चौबे सही मायने में छत्तीसगढ़िया नेता थे। कार्यक्रम में तुषार कांति बोस ने भी अपने विचार व्यक्त किए। दुर्ग के विधायक अरूण वोरा ने स्व. देवीप्रसाद चौबे के साथ अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि स्व. चौबे ने उनके पिता मोतीलाल वोरा के साथ राजनीतिक जीवन की शुरूआत की थी। उनका क्षेत्र के विकास में अविस्मरणीय योगदान है। कार्यक्रम में कृषि मंत्री रविंद्र चौबे सहित अन्य जनप्रतिनिधि मौजूद थे।
इंडिया टूडे के संपादक अंशुमान तिवारी ने अभिव्यक्ति की आजादी के मायने विषय पर अपना संबोधन दिया। तिवारी ने कहा कि लोकतंत्र कई देशों में है लेकिन अब लोकतंत्र की अवधारणा ये है कि क्या इस लोकतंत्र में प्रश्न पूछने की आजादी है। यदि वो प्रश्न सहित है तो जीवंत है यदि प्रश्न रहित है तो कागजी है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति प्रश्नों को स्थान देती है। पूरी व्यवस्था प्रश्न पूछने के अधिकार देती है। वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर ने कहा कि छत्तीसगढ़ में निर्भीक पत्रकारिता की परंपरा रही है।