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लाल आतंक से थर्राते एर्राबोर में फिर मुस्कुराने लगी जिंदगी, अब सरकार यहां बनाएगी उद्योग नगर

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लाल आतंक से थर्राते एर्राबोर में अब मुस्कुराने लगा है बचपन।

सुकमा, कोंटा, दोरनापाल, जगरगुंडा का नाम सुनकर आपके मन में क्या ख्याल आएगा ???  खूनी धमाके … लाल आतंक … मौत की आहट… चारों ओर फैली पहाड़ियों, जंगलों में दहशत ही दहशत … । इन्हीं  धमाकों -दहशतों के बीच बसा है एर्राबोर गांव… राजधानी रायपुर से 452 किलोमीटर दूर … एनएच 30 के किनारे बसा बस्तर का  यह सूदूर गांव शुरू से नक्सली हमलों, वारदातों का बड़ा सेंटर रहा है। खतरा इतना ज्यादा है कि कई बार सीआरपीएफ कैंप पर भी हमले हो चुके हैं। 16 जुलाई 2006 की स्याह रात के दौरान माओवादियों ने गांव के सैकड़ों मकानों में आग लगा दी। पूरा गांव जलकर खाक हो गया। कुल 32 लोग मारे गए। ज्यादातर लोग जिंदा जल गए । कई लोग आग से बचने के लिए भागे मगर नक्सलियों की गोली का शिकार हो गए।

आज से करीब सवा साल पहले अखबार समूह के स्थानीय संपादक ने उसी एर्राबोर में जीवन की खुशियां तलाशने कहा। उस क्रूरतम वारदात के 12 साल बाद … स्टोरी कवर करने हम एर्राबोर पहुंचे। खौफ और दहशत का पर्याय बन चुके एर्राबोर की पॉजिटिव स्टोरी कवर की, लेकिन संपादकीय कुप्रबंधन के कारण सवा साल बाद भी नहीं छपी। वही स्टोरी ,,, ताजा हालातों और नए अपडेट के साथ …. 

 

हनीफ निजामी

एर्राबोर जाने का आदेश मिलते ही दोपहर में कार से जगदलपुर रवाना हुए। वहां पहुंचने पर शाम हो चुकी थी। पहले से तय प्लान के मुताबिक होटल में ठहरने के बाद अगले दिन सुबह जल्दी तैयार होकर एर्राबोर जाने की सारी तैयारी कर ली। सुबह जगदलपुर से निकले तो सिर्फ आधे घंटे में ही कार झीरम घाटी से गुजर रही थी। … झीरम… यही है दरभा घाटी … वो भयंकर वारदात… स्तब्ध रह गया। सोचता रहा कि इस सड़क पर कैसा हौलनाक मंजर रहा होगा। जब यहां … कांग्रेस नेताओं के काफिले पर… बम धमाके के बाद ताबड़तोड़ गोलियां बरसाई गई। पहाड़ियों के बीच से गुजरती सड़क पर कैसी चीख-पुकार मची होगी …कितना रक्त बहा होगा इस हरी भरी घाटी पर ??? प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, महेंद्र कर्मा, वीसी शुक्ल, उदय मुदलियार …  एक-एक कर याद आने लगे। उफ… कितनी भयानक वारदात थी…। क्रूरतम । मन बोझिल हो उठा।

27deac69-6c60-42ab-b93f-da80c3b0e2c1.jpg  दोनों ओर पेड़ों के झुरमुट के बीच से हाईवे पर कार जैसे जैसे आगे बढ़ती गई, मौत के अनजाने खौफ का सन्नाटा भी उसी तेजी से पसरने लगा। बीच-बीच में बसे गांवों में जनजीवन सामान्य दिख रहा था लेकिन हर तरफ अनमनी सी खामोशी, अनजानी सी दहशत। घाटी की रंगत उड़ी-उड़ी … चारों ओर बिखरी हरियाली पर खौफ ही खौफ… जगह जगह सर्चिंग करते जवान … जमीन के नीचे न जाने कहां-कहां आईईडी बम हो … पेड़ों के पीछे घात लगाए माओवादियों के झुंड … बम धमाके … इसी की सर्चिंग में जुटे रहते हैं जवान।

ऐसे ढेर सारे अनजाने खौफ के साथ धुर नक्सली क्षेत्र सुकमा पहुंचे। जिला मुख्यालय होने के कारण यहां जनजीवन सामान्य था। मगर, छोटे से सुकमा शहर से आगे बढ़ते ही कुछ देर बाद आया दोरनापाल का इलाका… बोर्ड पर नाम पढ़ते ही खौफ फिर बढ़ने लगा। दर्जनों बार इस नाम को पढ़ चुका था। धुर नक्सली क्षेत्र दोरनापाल और आसपास के इलाकों में माओवादी गतिविधियों, बम धमाकों, फोर्स से मुठभेड़, वाहन, यात्री बसों को जलाने की न जाने कितनी घटनाओं की खबरें थी दिमाग में। आशंकाएं सिर उठाने लगी। कहीं रोड पर बारूदी सुरंग तो नहीं,,, प्रेशर बम, आईईडी तो नहीं ,,, पेड़ों के पीछे से अचानक फायरिंग शुरू तो नहीं हो जाएगी ,,, ऐसे कई खौफ भरे ख्याल दिलोदिमाग में आने लगे।

सुबह साढ़े 11 बजे …हम एर्राबोर पहुंचे। हाईवे पर बसा यह छोटा सा गांव है। कच्ची-पक्की झोपड़ियां। यहीं पर 13 साल पहले नक्सली हमले में तीन दर्जन लोग मारे गए थे। यहां सलवा जुडूम कैंप में रहने वाले आदिवासियों के मकानों में आधी रात को आग लगा दी गई। कई लोग जिंदा जल गए। आग से बचने कुछ लोग भागे तो गोलियों की बौछार शुरू हो गई। गोलियों का शिकार होकर दर्जनों लोगों ने दम तोड़ दिया। बमुश्किल 50 मीटर दूर सीआरपीएफ कैंप का 24 घंटे मुस्तैद रहने वाला सुरक्षा कवच तोड़कर जुडूम कैंप में उस समय की तबाही भरी वारदात में कई छोटे बच्चे और महिलाएं भी जलकर खाक हो गए थे।

उसी एर्राबोर गांव के एक छोर पर… पहुंच गए। एक दुकान के सामने कार रुकवाई। ड्राइवर को बताया था कि गांव में ज्यादा देर नहीं ठहरना है। कार के आसपास रहने की सख्त हिदायत देकर स्टोरी कवर करने आगे बढ़ा। साइकिल रिपेयरिंग की दुकान पर पंचर बनाते युवक ने टूटी-फूटी हिंदी में बताया कि इसी जगह पर गांव की सीमा समाप्त होती है। इससे आगे का रास्ता कोंटा की तरफ जाता है। सामने उप स्वास्थ्य केंद्र में अटेंडेंट ( शायद पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता था) मिला। उम्र शायद 20 साल की रही होगी। अटेंडेंट महिला को दवा की पुड़िया देते हुए समझा रहा था कि बुखार से पीड़ित बच्चे को कौन सी गोली (टेबलेट) कब खिलाना है।

बाहर निकलकर कार के आसपास नजर दौड़ाई तो ड्राइवर गायब। न कार के भीतर, न बाहर। आसपास कहीं भी नहीं। इधर उधर ड्राइवर की तलाश करता रहा। महज 10 मिनट पहले था… अब गायब… घबराहट बढ़ने लगी। अचानक  बाइक पर सवार तीन युवक कार के पीछे आकर रुक गए। मेरी तरफ घूरकर देखने लगे… फिर… साइकिल दुकान में पंचर बना रहे युवक से जोर से चिल्लाकर पूछा – दुसर कहां है रे ?

नक्सलियों का सूचना तंत्र काफी मजबूत होता है, यह पहले से पता था। मालूम था कि उनके इलाके में पहुंचने से पहले ही उन्हें भनक या कहें पूरी खबर हो जाती है। इसलिए, यह सवाल सुनते ही मेरी रूह कांप गई? ड्राइवर के साथ मैं उस गांव में आया था… वो लोग साफ-साफ पूछ रहे थे कि दूसरा कहां है। कहीं ये नक्सली तो नहीं… मेरे आने की खबर तो नहीं लग गई। मैंने वहां से सरक जाना ठीक समझा। धीरे-धीरे चलते हुए किराने की दुकान पर पहुंचकर देखा तो वो लोग जा चुके थे। मैंने चैन की सांस ली।

नक्सल प्रभावित गांवों के बच्चों को पढ़ाने सरकार ने यहां बालक आश्रम खोला है। आश्रम के हॉल में तीन बच्चे पढ़ाई करते मिले। अधीक्षक कौन है? कहां है? किस क्लास में पढ़ते हो ? जैसे सवाल किए तो भाषा की समस्या सामने आई। मैं हिंदी में सवाल करता रहा पर जवाब गोंडी (या हल्बी) भाषा में मिला … कुछ समझ नहीं आया। बस इतना ही समझ पाया कि आश्रम के इंचार्ज फिलहाल आश्रम से कहीं बाहर गए हैं। जानकारी जुटाने पर पता चला कि यहां आसपास के गांवों से आए दर्जनों बच्चे पढ़ाई करते हैं।

आंगनबाड़ी का पता पूछकर वहां पहुंचा तो छोटे बच्चे भोजन करने बैठ चुके थे। कई बच्चे मोल्डेड प्लास्टिक से बनी मिनी फिसलपट्‌टी पर अभी भी खेल रहे थे। आंगनबाड़ी केंद्र में पौष्टिक भोजन के साथ गिनती, अक्षर सीखने जैसी हर गतिविधियां सामान्य थी। यहां खेलते बच्चों के चेहरे पर न कोई नक्सली दहशत दिखी, न आंगनबाड़ी कार्यकर्ता इंद्रा देवी शर्मा के चेहरे पर कोई खौफ। महिला एवं बाल विकास विभाग की सेक्टर सुपरवाइजर बी मंजूलता ने बताया कि किशोरी बालिकाओं, गर्भवती महिलाओं को नियमित रूप से पौष्टिक आहार दिया जाता है।

कुछ देर बाद ड्राइवर के दर्शन हुए। उसने बताया कि वो खेत की तरफ चला गया था। दोबारा कहीं भी न जाने की कड़ी हिदायत के बाद सरपंच के घर का पता पूछकर वहां पहुंचा तो बताया गया कि सरपंच घर पर नहीं थी। ग्राम पंचायत कार्यालय में ग्रामीण, किराना दुकान में दुकानदार, ग्राहक के अलावा चाय की छोटी दुकान पर भी बातचीत की कोशिश की, हर जगह जवाब टूटी फूटी हिंदी में मिला। जनजीवन पूरी तरह सामान्य। एकदम सामान्य। कहीं कोई खौफ नहीं। कोई डर नहीं।

सवाल किया तो घूरता रहा, लगा जैसे कुल्हाड़ी से काट देगा

लेकिन ,,, सब कुछ इतना आसान भी नहीं था। आंगनबाड़ी केंद्र से आश्रम जाते हुए … गांव के एक कोने में सरपंच के घर से लौटते हुए … किराने की दुकान पर या चाय की गुमठी पर…. हर जगह दो-तीन युवक पीछा करते रहे। देखते रहे कि मैं कहां जा रहा हूं और किससे बातचीत कर रहा हूं ? मेरे हर मूवमेंट पर उनकी पैनी नजर थी। घूरते हुए एक-दो-बार उनकी आंखों में सख्त गुस्सा भी दिखा… अविश्वास भी … सिहरन पैदा करने वाली नजरें… न जाने क्या था उनके मन में। मेन रोड पर चाय की दुकान के पास कुल्हाड़ी लेकर खड़े एक युवक से बातचीत करने की कोशिश की। 2006 की उस भयानक वारदात को लेकर सवाल पूछा तो जवाब देने की बजाय गुस्से से घूरने लगा। चेहरे पर ऐसे भाव आए मानो कुल्हाड़ी से मुझे ही काट देगा। दोबारा सवाल करने की हिम्मत नहीं हुई।

अब यहीं बनेगा उद्योग नगर

हर दिन भयंकर खतरों के बीच रहने के बावजूद अपना नैसर्गिक जीवन जीने की आदिवासियों की ललक से इस गांव का जनजीवन फिर से सामान्य हो चुका है। सीधे-सरल ग्रामीणों की सकारात्मक सोच से गांव का जीवन धीरे धीरे बेहतर हो रहा है। भयंकरतम विषम परिस्थितियों के बावजूद ग्रामीणों की संकल्पशक्ति से गांव का जीवन फिर से पहले की तरह खुशहाल हो चला है। आत्मसम्मान से जीवन जीने की ललक पर नए पंख लगाते हुए हाल ही में राज्य सरकार ने एर्राबोर में उद्योग नगर बनाने की घोषणा की है। सरकार ने इच्छाशक्ति दिखाते हुए योजना का क्रियान्वयन किया तो लाल आतंक से थर्राते एर्राबोर की शिनाख्त मिनी इंडस्ट्रियल हब के रूप में होने लगेगी।

अब भी खतरे कम नहीं है गांव में

कई साल से कई खूनी वारदातों को झेल चुका… कई बार भयंकर घटनाओं का गवाह बन चुका… यह गांव पूरी तरह उजड़ने के बाद अब दोबारा बस चुका है। जनजीवन सामान्य हो चुका है लेकिन अभी भी खतरे टले नहीं हैं। हाल के कुछ महीनों में ही कई नक्सली रेकी करते पकड़े गए। फोर्स ने कई बम बरामद किए हैं। गांव के मुहाने पर सीआरपीएफ की बटािलयन के जवान हर समय चौकस रहते हैं। आने जाने वालों पर पैनी नजर। पूरी तरह मुस्तैद। मालवाहक वाहनों को रोककर चेकिंग करना… सघन पूछताछ का सिलसिला। लाल आतंक के खतरे अभी टले हैं… पूरी तरह खत्म कहां हुए हैं???

(स्टोरी कवर किए करीब सवा साल बीत चुके हैं। उस समय ली गई तस्वीरें डिलीट हो चुकी हैं। लिहाजा मुझे दोबारा फोटो की व्यवस्था करना पड़ा। इस न्यूज के साथ लगी तस्वीरें महिला एवं बाल विकास विभाग की सेक्टर सुपरवाइजर बी मंजूलता के सौजन्य से मिली हैं। )