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महापौर ने नगर निगम को समझने में बिता दिए 5 साल, सदन के भीतर-बाहर कोई नहीं समझ पाया सभापति का सुर-ताल

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ये रहा महापौर और निगम सभापति का रिपोर्ट कार्ड 

चंद्राकरनारायणी

दिसंबर 2014 में हुए नगरीय निकाय चुनाव में जीत दर्ज कर महापौर बनी चंद्रिका चंद्राकर नगर निगम के कामकाज की समझ न होने की समस्या से लगातार पांच साल तक जूझती रही। निगम के कामकाज को समझने में ही उनका पूरा कार्यकाल बीत गया। शहर के विकास के लिए उनके पास स्पष्ट सोच का पूरी तरह अभाव रहा। दूरगामी योजनाएं तो छोड़ दीजिये, छोटी-मोटी समस्याओं का समाधान करने या जवाब देने में भी उन्हें एमआईसी मेंबर दिनेश देवांगन या शिवेंद्र परिहार या निगम अफसरों की सलाह लेना पड़ा। नतीजा ये रहा कि पूरे 5 साल तक वे दूसरों की सलाह से काम करती रही।

यही वजह रही कि 5 साल में सिर्फ टाइम पास राजनीति हुई। उपलब्धि शून्य रही। महापौर और उनके समर्थक जलघर कॉम्पलेक्स, पुरानी गंज मंडी कॉम्पलेक्स, पीएम आवास, अमृत मिशन, फेज टू योजना जैसे बड़े प्रोजेक्ट को उपलब्धि गिना सकते हैं। मगर सच ये है कि कॉम्पलेक्स और फेज टू योजना पूर्व महापौर सरोज पांडेय के कार्यकाल में बनी थे। उसी समय स्वीकृति मिली। ये योजनाएं कछुआचाल से चलकर अब पूरी हो पाई हैं। अमृत मिशन प्रोजेक्ट, पीएम आवास योजना केंद्र सरकार ने लागू की। प्रोजेक्ट को तैयार करने,  मंजूरी और क्रियान्वयन की मॉनिटरिंग का काम भी शासन स्तर से हो रहा है। नगर निगम की भूमिका सिर्फ सहायक की है।

स्वच्छ भारत अभियान के तहत सफाई में नवाचार के लिए दुर्ग शहर को कई पुरस्कार मिले लेकिन इन कार्यों की उपलब्धि महापौर नहीं ले पाई। निगम कमिश्नर एसके सुंदरानी ने नवाचार किया और स्वाभाविक रूप से उपलब्धि भी हासिल की। स्वच्छता अभियान, प्रकाश व्यवस्था, निर्माण कार्यों और पानी सप्लाई जैसी किसी भी योजना में महापौर के पास विजन का पूरी तरह अभाव रहा।

विकास के लिए दूरगामी सोच, राजस्व बढ़ाकर नगर निगम को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में प्रभावी कदम उठाने सहित किसी भी कार्य में चंद्रिका पूरी तरह नाकाम रहीं। हालत इतनी बदतर रही कि करोड़ों की लागत से बनी दुकानों को अलाट करने का काम भी कई साल तक अटका रहा। शहर के बेहद जरूरतमंद गरीब पेंशनधारकों को समय पर पेंशन भुगतान के लिए कई महीने तक भटकना पड़ा। जरा सी प्रशासनिक कसावट से जो काम हो सकता था वो काम भी नहीं हो पाए। अफसरशाही पूरी तरह हावी रही। महापौर की प्रशासनिक दक्षता कहीं नहीं दिखीष

नगर निगम कार्यालय में भ्रष्टाचार की गूंज

चंद्रिका चंद्राकर के महापौर कार्यकाल के दौरान शौचालय निर्माण, पीएम आवास, शीतला तालाब सौंदर्यीकरण, अमृत मिशन, फेज टू योजना में भ्रष्टाचार की जमकर शिकायतें होती रही। शिकायतों का ठोस जवाब नहीं दिया जा सका। क्लीन सिटी ग्रीन सिटी का नारा साकार नहीं हो पाया। गटर बन चुके निस्तारी तालाबों की हालत नहीं सुधर पाई। प्रमुख नालों का पानी ट्रीटमेंट करने की योजना भी शुरू नहीं हो पाई। शहर में डेंगू, डायरिया, पीलिया से मौतें होती रही। और तो और आवारा कुत्तों के लिए डॉग हाउस और वर्तमान सरकार की बड़ी योजना गौठान को शुरू करने में भी निगम की व्यवस्था पूरी तरह नाकाम रही।

भ्रष्टाचार पर तीखे प्रहार, सदन के भीतर-बाहर कोई नहीं समझ पाया सभापति का सुर-ताल

सत्तापक्ष से तालमेल न होने के कारण निगम सभापति राजकुमार नारायणी की सभा संचालन की केमेस्ट्री लगातार बदली। नगर निगम में महापौर सहित बहुमत अगर भाजपा का हों और सभापति कांग्रेस का हों तो तालमेल न बैठ पाना आम बात है, लेकिन नारायणी ने पूरे कार्यकाल के दौरान कई बार सुर बदले। कई बार ताल भी बदल दिए। कई बार आरोप लगे कि सत्तापक्ष और सभापति के सुर एक हो गए हैं। शुरुआती दौर में महापौर समेत सत्तापक्ष के पार्षदों के घनघोर विरोधी रहे नारायणी को कई बार सदन में अपने ही कांग्रेस पार्षदों के कोप का शिकार होना पड़ा। सभा संचालन के अलावा कार्यकाल के दौरान वे निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार उजागर करते रहे। अफसरों को भ्रष्टाचार के मामले में लगातार घेरते रहे। इक्का दुक्का मामलों में राज्य शासन स्तर पर जांच के आदेश भी जारी हुए। कुछ मामलों में अफसरों की गिरफ्तारी भी हुई। सभा संचालन के मामले में उनकी परफार्मेंस सामान्य मानी जाएगी। भ्रष्टाचार के मामले उजागर करना उनकी उपलब्धि रही। इस कारण उनका कार्यकाल औसत से कुछ बेहतर माना जा रहा है।