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रविवार को मुख्यमंत्री ने पैरादान की अपील की, एक दिन में ही जिले में इकट्‌ठा हो गया 1119 क्विंटल पैरा

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रबी फसल तक चारे की चिंता नहीं, खुद ट्रैक्टर से गौठान तक पैरा छोड़ने आए ग्रामीण

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दुर्ग। धान खरीदी के पहले दिन जामगांव एम पहुंचे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ग्रामीणों से पैरादान की अपील की थी। अपील का असर ये हुआ कि जिले भर में करीब 1119 क्विंटल पैरा इकट्ठा हो गया। गांव-गांव में ग्रामीणों ने पैरादान किया। लोग खुद ट्रैक्टर में पैरा भरकर गौठान में छोड़ने आए। ग्रामीणों ने इतना पैरा दान कर दिया है कि रबी फसल तक पशुओं के लिए चारे का इंतजाम हो गया है। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री की अपील पर कहा कि इससे न सिर्फ पशुओं को चारा मिलेगा बल्कि पर्यावरण संरक्षण भी हो सकेगा।

सीएम ने 1 दिसंबर को जामगांव एम में ग्रामीणों से कहा कि गौठान आपके हैं। अपने पशुओं के संवर्धन के लिए, फसल को बचाने के लिए पैरादान करने आप सब आगे आएं। इसका असर पूरे जिले में महसूस हुआ। दोपहर दो बजे तक गौठानों में 1119 क्विंटल पैरा एकत्रित हो चुका था। सोमवार को कलेक्टर अंकित आनंद ने सरकारी अमले को निर्देश दिए थे कि व्यापक स्तर पर जनजागरूकता फैलाकर पैरा दान कराएं। गांव-गांव में मुनादी कराई गई।

आज जिला पंचायत के सीईओ कुंदन कुमार उन गांवों में गए जहां गौठान का निर्माण किया गया है। उन्होंने कहा कि गौठान में पशुओं के लिए जितना ज्यादा चारा रहेगा, मवेशियों से फसल नष्ट होने का खतरा उतना ही कम होगा। इससे  ग्रामीणों को ही फायदा होगा। जिन गांवों में गौठानों में पशु रखे गए हैं, वहां की फसल सुरक्षित रहेगी। कंपोस्ट खाद का उत्पादन भी शुरू हो गया है। सीईओ आज पंचायतों की बैठक में भी गए जहां विशेष रूप से लोगों को पैरादान के लिए बुलाया गया था।
ग्रामीण खुद आगे आ रहे हैं पैरादान के लिए

सरपंच पुष्पा चंद्राकर ने बताया कि पैरा इकट्ठा करने सुविधा के लिए जिला प्रशासन ने बेलर दिया है। बेलर बहुत तेजी से चारे का गट्ठा बनाता है। अभी गांव के किसान राकेश चंद्राकर के खेत में बेलर है। उन्होंने लगभग सात एकड़ खेत का पैरादान किया है। बेलर सुबह से  34 गट्ठे बना चुका है। एक गट्ठे में लगभग 25 किलोग्राम पैरा होता है। अब इन्हें गौठान तक छोड़ा जाएगा। गौठानों के विकास के लिए ग्रामीण खुद आगे आकर सहयोग कर रहे हैं। रथ के माध्यम से लोगों से अपील की जा रही है। मुनादी भी कराई जा रही है।
अफसरों ने बताया कि गांव गांव में हो रही बैठकों में ग्रामीणों को पराली जलाने के दुष्प्रभाव के बारे में बताया जा रहा है। पराली जलाने से हवा प्रदूषित होती है। मिट्टी पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। पर्यावरण से जुड़ी संस्था डाऊन डू अर्थ के मुताबिक पराली जलाने से मिट्टी का तापमान 33.8 डिग्री से बढ़कर 42.2 डिग्री तक पहुंच जाता है। इससे मिट्टी के स्वास्थ्यवर्धक बैक्टीरिया और फंगल नष्ट हो जाते हैं। यह बैक्टीरिया और फंगल मिट्टी की सेहत के लिए काफी अच्छे होते हैं और इनके नष्ट होने से मिट्टी की ऊर्वरा शक्ति कम हो जाती है। पौधों की कीटों से लड़ने की प्रतिरोध क्षमता कम हो जाती है। डाऊन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक एक टन पराली जलाने से मिट्टी की 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फास्फोरस और 25 किलोग्राम पोटैशियम तथा 1 किलोग्राम सल्फर नष्ट हो जाती है।
1119 क्विंटल पराली से हो सकता था इतना प्रदूषण

अनुमान के मुताबिक एक टन पराली जलाने पर हवा में तीन किलो कार्बन कण, 60 किलो कार्बन मोनो आक्साइड, 200 किलो राख, 1500 किलो कार्बन डाइआक्साइड, 2 किलो सल्फरडाई आक्साइड निकलता है। जिले में 1119 क्विंटल पैरा बचाने से वायु प्रदूषण में काफी कमी आएगी। इससे हवा में 333 किलो कार्बन कण नहीं घुलेंगे। हवा में 6660 किलो कार्बन मोनो आक्साइड, 166500 किलोग्राम कार्बनडाइ आक्साइड, 22200 किलोग्राम राख, 222 किलो सल्फर डाई आक्साइड दुर्ग के वातावरण में नहीं घुलेगी।