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बीमारी के इलाज का क्लेम नहीं दिया, जिला उपभोक्ता फोरम ने बीमा कंपनी पर लगाया 34 हजार रुपए हर्जाना

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बीमा अवधि में नाक की बीमारी का इलाज कराने के बाद क्लेम का भुगतान न करने पर ग्राहक के प्रति सेवा में निम्नता मानते हुए जिला उपभोक्ता फोरम ने आईसीआईसीआई लोंबार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी पर 34 हजार 151 रुपए हर्जाना लगाने का आदेश पारित किया है। बीमा कंपनी को ग्राहक के प्रति सेवा में निम्नता और व्यवसायिक कदाचरण का जिम्मेदार पाते हुए जिला उपभोक्ता फोरम के सदस्य राजेन्द्र पाध्ये और लता चंद्राकर ने क्लेम राशि 27151 रुपए, मानसिक क्षतिपूर्ति स्वरूप 6 हजार रुपए और वाद व्यय के रूप में 1000 रुपए अदा करने के आदेश दिए हैं। साथ ही क्लेम राशि पर 7.50 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज भी देना होगा।

ये है प्रकरण

आर्य नगर दुर्ग निवासी मनीष जैन ने आईसीआईसीआई लोंबार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी से बीमा पॉलिसी ली थी। पॉलिसी प्रमाणपत्र के साथ उसे रिस्क कवर के तहत होने वाली बीमारियों की सूची प्रदान की गई, जिसमें नाक संबंधी बीमारी के इलाज की राशि देने का उल्लेख किया गया था। दिसंबर 2015 में परिवादी की नाक में बीमारी होने पर वह इलाज के लिए पं. जवाहरलाल नेहरू हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर सेक्टर 9 भिलाई में 21 फरवरी 2016 को भर्ती हुआ। नाक का आपरेशन कराया। इलाज में खर्च राशि का क्लेम करने पर बीमा कंपनी ने दावा निरस्त कर दिया।

बीमा कंपनी का जवाब

बीमा कंपनी ने प्रकरण की सुनवाई के दौरान बताया कि परिवादी ने नाक का इलाज कराया है। सेप्टोप्लास्टी कराना बीमा पॉलिसी के अंतर्गत कवर्ड नहीं है। इसलिए क्लेम का भुगतान करना संभव नहीं है।

फोरम का फैसला

प्रकरण में सुनवाई के दौरान जिला उपभोक्ता फोरम के सदस्य राजेन्द्र पाध्ये और लता चंद्राकर ने पाया कि अनावेदक बीमा कंपनी ने परिवादी को शल्यक्रिया चिकित्सा की जो सूची प्रदान की है उसमें यह उल्लेख किया है कि नाक के अन्य ऑपरेशंस कवर होंगे, जिसके तहत नाक के सभी ऑपरेशन आ जाते हैं और परिवादी का सेप्टोप्लास्टी का इलाज भी इसमें शामिल है। इस कारण परिवादी दावा राशि पाने का अधिकारी है। प्रकरण में यह बात सामने आई कि बीमा कंपनी ने परिवादी को सीधे प्रत्यक्ष रूप से पॉलिसी जारी नहीं की है बल्कि अनावेदक क्रमांक 2 जैन इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन के मार्फत उसे पॉलिसी दिलाई गई है। परिवादी को पॉलिसी के नियम और शर्तें स्पष्ट रूप से समझायी गई थी, यह स्थिति दिखाई नहीं देती है। यदि पॉलिसी जारी करते समय ही अनावेदकगण परिवादी को वस्तुस्थिति सही तरीके से समझा दिया होता तो परिवादी भ्रमपूर्ण शब्दावली वाली पॉलिसी नहीं लेता। बीमा कंपनी के इस बचाव को खारिज कर दिया गया कि उसने नियम, शर्तों अपवर्जन और सीमाओं के साथ पॉलिसी जारी की थी। बीमा कंपनी अपने इस बचाव के समर्थन में ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सकी।