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कठपुतली महापौर की छवि से क्या मुक्त हो पाएगा दुर्ग नगर निगम ???

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पिछले 10 साल से हिडन हैंड के इशारे पर अफसरों ने ही चलाया है निगम प्रशासन, महापौर की भूमिका शून्य रही

सीजी न्यूज डॉट कॉम

कठपुतली महापौर … ये शब्द कुछ ज्यादा कड़ा तो नहीं है? फिर भी, शहर हित के लिए यह जरूरी है। शहर की जनता के लिए, जनहित के लिए और शहर के समग्र विकास के लिए इस सवाल पर गौर करना बेहद जरूरी है। इसके नफे नुकसान पर कार्यकाल शुरू होने के साथ ही चर्चा करना भी जरूरी है। वरना, दुर्ग नगर निगम अगले पांच साल तक पपेट महापौर की छवि से मुक्त नहीं हो पाएगा। इसका फायदा तो कुछ नहीं होगा, नुकसान बहुत ज्यादा होगा। मुख्यमंत्री के गृह जिला मुख्यालय होने का लाभ भी दुर्ग शहर की जनता को नहीं मिल पाएगा। शहर को समग्र विकास की वैसी सौगात नहीं मिल पाएगी, जैसी उम्मीद की जा रही है।

दरअसल, दुर्ग नगर निगम के पिछले 10 साल का कार्यकाल इसी शब्द पर केंद्रित रहा। जनवरी 2010 में दुर्ग नगर निगम के महापौर बने थे डॉ. शिव कुमार तमेर। बेहद उच्च शिक्षित महापौर। सेक्टर 9 स्थित जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा संस्थान जैसे उच्च संस्था के प्रमुख होने के कारण प्रशासनिक कार्यों का अनुभव रखने वाले डॉ. तमेर शहर के विकास के लिए काफी स्पष्ट सोच रखते थे। इसके बावजूद वे कुछ नहीं कर पाए। निगम अफसर ‘ हिडन हैंड ’ के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचते रहे। विकास का रोड मैप होने के बावजूद डॉ. तमेर की अनसुनी की गई। पूरे पांच साल तक वे अपनी सोच के अनुरूप कुछ नहीं कर पाए।

जनवरी 2015 में चंद्रिका चंद्राकर ने महापौर पद की शपथ ली। इस बार भी मामूली बदलाव के साथ वही कहानी दोहराई गई। चंद्रिका चंद्राकर के पास कोई प्लान नहीं था। सोच नहीं थी। नगर निगम की प्रशासनिक शक्तियां इस बार भी नगर निगम चलाती रही। हिडन हैंड के इशारे पर निगम अफसरों ने महापौर चंद्रिका चंद्राकर से जो कहा, चंद्रिका ने वही किया। उनके इर्द गिर्द रहने वाले पार्षदों के सहारे दूसरे छिटपुट कामकाज होते रहे। चंद्रिका के पास शहर के विकास का कोई रोड मैप ही नहीं था। निगम अफसरों के बने मनमाने प्लान के हिसाब से पांच साल बीत गए।

नुकसान ये हुआ

मार्केट का बिना सर्वे किए जलघर कॉम्पलेक्स, गंजमंडी कॉम्पलेक्स का निर्माण कर दिया गया। अब हालत ये है कि दुकानों के खरीदार नहीं मिल रहे। व्यवसायी करोड़ों की लागत से बने कॉम्पलेक्स में दुकानें लेने के लिए तैयार नहीं हैं। तालाब सौंदर्यीकरण के नाम पर भ्रष्टाचार होता रहा। गार्डन रेनोवेशन के नाम पर एक ही काम की कई बार बिलिंग होने की खबरें सुर्खियों में रही। फाइलें गायब होती रही। कई काम लटके रहे। निगम अफसरों पर कोई अंकुश नहीं रखा जा सका। बोरसी मार्केट की दुकानों का आवंटन बार-बार टलता रहा। जल कार्य विभाग में मेंटेनेंस के नाम पर लाखों की फर्जी बिलिंग होती रही। निगम की प्रशासनिक मशीनरी भ्रष्टाचार में डूबी रही। इस पर कोई नियंत्रण नहीं रहा।  इमेज टूटेगी या … 

कांग्रेस के हाथ में निगम की सत्ता आने के बाद हिडन हैंड का रोल खत्म हो चुका है। लेकिन नव निर्वाचित महापौर धीरज बाकलीवाल क्या कठपुतली महापौर की इमेज को तोड़ पाएंगे ? महापौर चुने जाने के बाद धीरज ने अब तक ऐसा कोई उदाहरण पेश नहीं किया है जिससे लगे कि इमेज टूट पाएगी। हालांकि, इतनी जल्दी आकलन करना ठीक नहीं है। फिर भी पिछले तीन दिनों की एक्टिविटी में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है जिससे ये पता चल सके कि दुर्ग नगर निगम को 10 साल से मनमाने तरीके से चला रहे निगम अफसरों पर कोई लगाम कसी जाएगी भी या नहीं। मल्टीलेवल पार्किंग, मार्केट की बेतरतीब व्यवस्था, यातायात व्यवस्था बेहतर बनाने की प्लानिंग, गोकुल धाम, वाटर सप्लाई सिस्टम, सफाई व्यवस्था सहित किसी भी मुद्दे पर महापौर धीरज बाकलीवाल का विजन सामने नहीं आया है। शहर की समस्याओं को पिछले चार दशकों से देखने समझने के बावजूद अब तक उन्होंने अफसरों की हां में हां मिलाई है। शहर का समग्र विकास करना है तो महापौर को इस छवि को तोड़ना पड़ेगा। ये काम जितनी जल्दी हो जाए, उतना अच्छा।