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दुर्ग / जिला न्यायाधीश व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण दुर्ग के अध्यक्ष राजेश श्रीवास्तव के मार्गदर्शन व निर्देशन में जागरूकता अभियान के तहत अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश मधु तिवारी और अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश नीरू सिंह ने शिविर में जमीन खरीदने से पहले जरूरी सावधानियां बरतने और इससे संबंधित कानून के संबंध में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जमीन खरीदने से पहले जमीन के मालिकाना हक की जांच जरूर करना चाहिए।

खरीदने वाले को यह मालूम होना चाहिए कि जो शख्स जमीन बेच रहा है, वही संपत्ति का असली मालिक है और उसके पास ही जमीन बिक्री के सारे अधिकार हैं। कोई भी संपत्ति खरीदने से पहले स्थानीय अखबारों (खासतौर पर अंग्रेजी या स्थानीय भाषा) में खरीदी जाने वाली प्रस्तावित भूमि पर किसी भी दावे को आमंत्रित करने के लिए पब्लिक नोटिस देना चाहिए। इससे पता चल जाएगा कि जमीन पर किसी तीसरे पक्ष के अधिकार तो नहीं हैं।

जमीन खरीदने से पहले खरीददार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संपत्ति कर का भुगतान हस्तांतरण की तारीख तक किया जा चुका है और वेरिफिकेशन के लिए इस तरह के भुगतान के लिए मूल रसीदें तैयार हैं। यह तय करना भी जरूरी है कि मालिक के नाम पर खाता (मालिक के नाम को दर्शाती रेवेन्यू रिकॉर्डिंग) उपलब्ध है। जमीन खरीददारों को सलाह दी जाती है कि वे अपने नाम पर रजिस्ट्रेशन करने से पहले जमीन की नापजोख कर लें। यह सुनिश्चित करने के लिए कि जमीन के टुकड़े की माप और उसकी सीमाएं सही हैं, खरीदार को किसी मान्यता प्राप्त सर्वेक्षणकर्ता की मदद लेनी चाहिए।
संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर सर्वाेच्च न्यायालय ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वाेच्च न्यायालय ने एक बार फिर कहा है कि दाखिल खारिज में नाम होने से ना तो ये साबित होता है कि आप ही जमीन के मालिक हैं और ना ही इस से आपका हक खत्म होता है। ‘‘केवल रेवेन्यू रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने से किसी व्यक्ति को संपत्ति का मालिकाना हक नहीं मिल जाता है। केवल इस बुनियाद पर कि उसका नाम रिकॉर्ड में मौजूद है, ये तय नहीं किया जा सकता।
रेवेन्यू रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने के पीछे मुख्य कारण वित्तीय उद्देश्यों को पूरा करना है, जिनमें भू-राजस्व का भुगतान शामिल है। केवल इस एंट्री को मालिकाना हक का आधार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर किसी भी तरह का विवाद पैदा होने की सूरत में दावा करने वाले सभी पक्षों को व्यवहार न्यायालय में जाना होगा। जब कोई पक्षकार वसीयत के आधार पर दाखिल खारिज में नाम दर्ज कराने की मांग करता है तो उसे वसीयत को लेकर इस अधिकार क्षेत्र से संबंधित में जाना होगा।
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