- बजट के प्रस्तावों में न वजन है … न विजन …
- दुर्ग निगम बजट बोले तो … खाली डब्बा … खाली बोतल … और क्या …
द सीजी न्यूज डॉट कॉम
करीब 20 साल पहले तत्कालीन महापौर सरोज पांडेय के कार्यकाल में पुरखों की स्मृति में वृक्षारोपण की योजना शुरू की गई थी। बड़े पैमाने पर प्रचार प्रसार किया गया। शहर के नामचीन लोगों को एप्रोच किया गया। दिवंगत लोगों की स्मृति में बड़ी संख्या में शिवनाथ तट पर पौधे रोपे गए। कुछ दिनों बाद रखरखाव के अभाव में पौधे सूखने लगे। जिनकी स्मृति में पौधे रोपे गए थे, उनकी नाम पटि्टका भी गायब हो गई। चंद दिनों में ही योजना पूरी तरह धराशायी हो गई। अब दो दशक बाद वही धराशायी योजना झाड़ पोंछकर दोबारा नगर निगम के बजट में शामिल की गई है।
29 मार्च को पेश होने वाले निगम बजट के प्रमुख प्रस्तावों पर गौर करें तो पता चलेगा कि इसमें नया कुछ भी नहीं है। नगर निगम के बजट में शहर विकास का विजन ही नहीं है। एकाध प्रस्ताव को छोड़ दें तो लगभग सभी प्रस्ताव पुराने बजट से ही लिये गए हैं। बजट प्रस्तावों को देखकर लगता है कि कांग्रेस की मौजूदा परिषद नई बोतल में पुरानी … वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है।
शायद बजट जल्दबाजी में तैयार किया गया है …
बजट पेश करने से दो दिन पहले बजट पुस्तिका मिलने के बाद पार्षदों की त्वरित प्रतिक्रिया आई है कि पुराने बजट के कई प्रस्तावों को कापी-पेस्ट कर लिया गया है …
लोग चुटकी ले रहे हैं कि कान्हा किसली टूर का प्रोग्राम बनाने में पूरा ध्यान लगा रहा, शायद इसीलिए बजट पर फोकस नहीं कर पाए …
- इन उदाहरणों से समझें किस तरह कापी पेस्ट कर बनाया गया है बजट …
… वही दो दशक पुराना … शहर को ग्रीन सिटी बनाने का प्रस्ताव।
… हर घर ग्रीन के नाम से प्रस्ताव शामिल किया गया है। पूर्वजों की स्मृति में लोगों को घर पर पौधे लगाने प्रोत्साहित किया जाएगा। पुरखों के सुरता नाम से शिवनाथ नदी रोड पर स्मृति वन विकसित किया जाएगा।
… दो दशक पुराना … हर बजट में शामिल … तालाब सौंदर्यीकरण का प्रस्ताव
… दो दशक से लगभग हर बजट में शामिल … गुमटी योजना
… दो दशक से लगभग हर बजट में शामिल मुक्तिधाम विकास योजना
… वही दो दशक से बजट में शामिल … कामकाजी महिलाओं के लिए हॉस्टल (पालिटेक्निक कालेज परिसर में करोड़ों की लागत से बन चुका है।)
आप अंदाज लगा सकते हैं कि महापौर धीरज बाकलीवाल 29 मार्च को कैसा बजट पेश करने वाले हैं ???
20 साल बाद निगम की सत्ता मिलने के बावजूद विकास का विजन नहीं … एक भी प्रस्ताव वजनदार नहीं …
पूरा ध्यान नाचने-गाने और पिकनिक मनाने में है। मनोरंजक कार्यक्रमों को बढ़ावा देना जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी शहर और शहरवासियों की समस्याओं की फिक्र करना है। शहरवासियों के हितों को लेकर निगम के जिम्मेदारों को जितना फिक्रमंद होना चाहिए, वो फिक्र नगर निगम की परिषद में नहीं दिख रही है। डेढ़ साल बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। सत्तापक्ष से महापौर और एमआईसी मेंबरों के साथ कांग्रेसी पार्षद नगर निगम का कौन सा चेहरा लेकर आम जनता के बीच लेकर जाएंगे। यह अहम सवाल।
तो,
इन हालात में क्या कहें … बस यही कहेंगे …
ये नगर निगम का बजट है … या दुर्भाग्य है ,,, दुर्ग का …
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