
द सीजी न्यूज डॉट कॉम
बीते एक हफ्ते से कांग्रेस की राजनीति में उठा तूफान आखिरकार शांत हो गया। विधायकों से मिले एकतरफा समर्थन और कांग्रेस संगठन की एकजुटता से सत्ता से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को बेदखल करने की कोशिशों का अंत हो गया। मगर, अब देश की राजधानी दिल्ली से संकेत मिल रहे हैं कि भूपेश को हटाने की बाकायदा साजिश रची गई। यह साजिश कुछ बड़े औद्योगिक घरानों ने रची थी। चौंकाने वाली बात पता चली है कि कांग्रेस के एक सीनियर लीडर भी इस साजिश में शामिल थे।
देश के एक बड़े मीडिया समूह की रिपोर्ट में इसका सांकेतिक रूप से खुलासा किया गया है। दरअसल भूपेश बघेल को हटाने की साजिश के पीछे नगरनार स्टील संयंत्र, कोल खनन माफिया और लौह अयस्क खनन और तीन काले कृषि कानूनों का फायदा उठाने की तैयारी करने वाले औद्योगिक घराने शामिल हैं। हमारे सूत्र बता रहे हैं कि इस षड्यंत्र में जिस कांग्रेस नेता की संलिप्तता बताई जा रही है, वे पिछले एक हफ्ते के राजनीतिक घटनाक्रम में भी केंद्र में रहे हैं। ये महानुभाव कांग्रेस नेता राहुल गांधी के करीबी नेताओं में से एक हैं।
साजिश के तार कैसे बुने गए? इसे समझने के लिये कुछ महीनों में हुए घटनाक्रमों को समझना होगा। दरअसल, केंद्र की मोदी सरकार ने कुछ महीने पहले बस्तर के नगरनार संयंत्र को बेचने के संकेत दिये थे। यह खबर अखबारों में छपते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बस्तर सहित पूरे छत्तीसगढ़ के हितों को ध्यान में रखते हुए तत्काल घोषणा कर दी – किसी भी सूरत में नगरनार संयंत्र निजी हाथों में नहीं जाएगा। अगर केंद्र सरकार ने इसे बेचने का प्रयास किया तो छत्तीसगढ़ सरकार ही संयंत्र को खरीद लेगी।
भूपेश का यह फैसला नगरनार स्टील प्लांट खरीदने की तैयारी कर रहे देश के एक बड़े औद्योगिक घराने की राह का बड़ा रोड़ा बन गया। इस घराने के तार देश की सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे लोगों के साथ जुड़े हैं। भूपेश बघेल को हटाने की साजिश की शुरुआत भी यहीं से शुरू हुई। छत्तीसगढ़ में स्टील उद्योग के साथ ही कोयले की खदानों में अपना साम्राज्य फैलाने की इच्छा रखने वाले इस औद्योगिक घराने ने षड्यंत्र में राहुल गांधी के करीबी एक नेता को भी शामिल किया। तय हुआ कि सत्ता पलटने के बाद नगरनार स्टील प्लांट, कोल खनन सहित अन्य औद्योगिक हितों को साधने में “बाबा” का उपयोग किया जाएगा।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का ढाई साल का कार्यकाल 16 जून को पूरा होने से महीनों पहले ही साजिश ने रंग दिखाना शुरू कर दिया। इस साजिश में भाजपा नेताओं ने बड़ा रोल निभाया। 6 महीने पहले से ही छत्तीसगढ़ के प्रमुख भाजपा नेताओं ने लगातार बयान दिये कि सत्ता परिवर्तन होना तय है। रमन सिंह, विष्णुदेव साय, सरोज पांडेय सरीखे नेता साजिश को हवा देने के लिये लगातार बयानबाजी करने लगे।
वार भूपेश पर : निशाने पर किसान, मजदूर, आदिवासी
भूपेश सरकार ने छत्तीसगढ़ के किसानों को समृद्ध बनाने पर फोकस किया है। राजीव गांधी किसान न्याय योजना के जरिये राज्य के 20 लाख से अधिक किसान परिवारों को देश में सबसे ज्यादा समर्थन मूल्य दिया जा रहा है। खेती से जुड़े भूमिहीन मजदूरों को 6 हजार रुपए वार्षिक सहायता देने का फैसला भी भूपेश सरकार ने किया। कई राज्यों के किसान संगठन भूपेश के किसान मॉडल को अपने राज्य में भी लागू करने की मांग कर रहे हैं। 52 वनोपजों की खरीदी समर्थन मूल्य पर होने से फारेस्ट माफिया और इनसे जुड़े उद्योगों के हित प्रभावित हो रहे थे।
किसान, आदिवासी, मजदूर हितैषी के रूप में भूपेश बघेल की विराट होती छवि से उस औद्योगिक घराने को सबसे बड़ा नुकसान हो रहा है जिसने तीन कृषि कानूनों का फायदा उठाने देश भर में गोदाम बनाए हैं। सूत्रों का कहना है कि नगरनार स्टील प्लांट खरीदने की तैयारी भी इसी औद्योगिक घराने ने की थी, जिसे भूपेश बघेल के प्लांट खरीद लेने के बयान से तगड़ा झटका लगा। इसी घराने से जुड़े लोगों ने छत्तीसगढ़ की कांग्रेसी राजनीति में संकट खड़ा किया। इस षड्यंत्र में एक प्रभावशाली कांग्रेस लीडर के साथ भाजपा नेताओं को भी शामिल किया गया। साजिश के तहत तय हो चुका था कि सत्ता पलट के बाद किसानों, आदिवासियों के हित में किये गए भूपेश के फैसलों को एक-एक कर वापस ले लिया जाएगा।
यानी भूपेश पर वार जरूर किया जा रहा था लेकिन निशाने पर किसान, आदिवासी और मजदूर थे। कांग्रेस विधायकों की एकजुटता और संगठन की ताकत से यह साजिश तार-तार हो गई।
(कुछ और खुलासे अगली रिपोर्ट में …. )
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