
द सीजी न्यूज डॉट कॉम
पांच राज्यों में हुए चुनावों के नतीजों से साफ हो गया है कि कांग्रेस के हाथ कुछ भी नहीं लगा है। आज मतगणना शुरू होने से पहले अटकलें लगाई जा रही थी कि शायद गोवा और उत्तराखंड में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हो सकती है। लेकिन, दोपहर बाद से ही तय हो गया है कि कांग्रेस को चुनाव में हताशा के सिवा कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। देश की सबसे बड़ी पार्टी को अब व्यापक आत्मचिंतन की जरूरत है। लेकिन, कांग्रेस के सोनिया-राहुल-प्रियंका गांधी युग में कोई गंभीर आत्मचिंतन होगा, इसकी उम्मीद कम है।
दरअसल कांग्रेस में जिस अंदाज में फैसले लिये जा रहे हैं, उससे टीम राहुल पर उंगलियां उठ रही है, और पार्टी को एक के बाद दूसरी पराजय का सामना भी करना पड़ रहा है। केंद्रीय स्तर पर दिग्गज कांग्रेस नेताओं के बड़े समूह को एक कोने में बैठा दिया गया है। कई दिग्गज नेताओं को पार्टी मुख्यालय में तवज्जो ही नहीं मिल रही है। राहुल की टीम में शामिल सलाहकारों के फैसले पार्टी के नेताओं को रास नहीं आ रहे। अटपटे भी हैं।
देश की सबसे बड़ी महामारी और सबसे बड़ी त्रासदी से निपटने में केंद्र और भाजपा शासित राज्यों में सरकार के विफल होने के बावजूद कांग्रेस पार्टी फील्ड से गायब होती जा रही है। ट्विटर और फेसबुक लाइव पर ज्यादा चल रही है कांग्रेस। वो भी बेमन से … आधे अधूरे अंदाज में। जमीनी स्तर पर गायब रहने के साथ ही कांग्रेस की सक्रियता सोशल मीडिया पर भी प्रतिद्वंदी दल से मीलों पीछे है।
पार्टी की दुर्गति इस कदर हो चुकी है कि उत्तर प्रदेश में पिछले तीन दशक से पार्टी सत्ता से बाहर है। संगठन का बुरा हाल है। इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। गजब तब हुआ जब यूपी के नेताओं को पूरी तरह दरकिनार करते हुए अकेले प्रियंका गांधी ही चुनाव प्रचार अभियान को संभाले रही। प्रियंका गांधी के अलावा केवल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ही प्रचार अभियान की बागडोर संभाले रहे।
संगठन की दुर्गति और यूपी के नेताओं की उपेक्षा किये जाने से आहत कांग्रेसियों ने चुनाव में महज खानापूर्ति ही की। चुनाव अभियान से कांग्रेस के सारे लीडर्स दूर ही रहे। एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार – प्रियंका गांधी ने संगठन का ढांचा मजबूत बनाए बिना ही चुनाव जीतने की जंग शुरू कर दी। प्रियंका और उनकी टीम का यह काम बिलकुल वैसा ही माना जा रहा है, जैसे पटरी के बिना ट्रेन चलाने की कोशिश।
नतीजा, यूपी चुनाव में पार्टी की इतनी ज्यादा दुर्गति हुई, जितनी पहले कभी नहीं हुई।
पंजाब में चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस हाई कमान ने जिस अंदाज में कैप्टन, सिद्धू और चन्नी को आपस में भिड़ाया, उसने पंजाब में पार्टी की मजबूत स्थिति को तार-तार कर दिया। पंजाब एपिसोड के लिए टीम राहुल के फैसले ही जिम्मेदार माने जा रहे हैं। नतीजा, हाथ से पंजाब निकल गया।
चुनाव विशेषज्ञों का कहना है कि यूपी में ताकत झोंकने की बजाय अगर उत्तराखंड और गोवा ( जहां कांग्रेस की जीत की उम्मीदें की जा रही थी ) में पार्टी की ताकत लगाई जाती तो कम से कम दो राज्य आज कांग्रेस के खाते में होते। लेकिन बेस मजबूत न होने के बावजूद यूपी में चुनाव लड़ने की जिद के साथ ताकत झोंकने और पंजाब में पार्टी को खंड-खंड में बांटने के फैसलों का असर उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर की जनता पर भी पड़ा। जनता समझ चुकी है कि कांग्रेस में पार्टी को रसातल की ओर ले जाने वाले फैसले लिये जा रहे हैं। लिहाजा, जनता ने कहीं वापस भाजपा को सत्ता की चाबी सौंप दी तो कहीं आप पर भरोसा जताया।
बड़ा सवाल ये है कि क्या राहुल गांधी और कांग्रेसी राजनीति में हाशिये पर डाले जा चुके जी-23 ग्रुप के सदस्यों के बीच कोई तालमेल बैठेगा या पार्टी ऐसे ही बिखराव की ओर बढ़ती रहेगी ???
बड़ा सवाल ये भी है कि क्या चुनाव में पार्टी के सफाए के बाद भी राहुल गांधी ही पार्टी की कमान संभालेंगे ??? या किसी सीनियर लीडर को पार्टी की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी ???
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