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कांग्रेस के लिए आसान नहीं है भिलाई चरोदा निगम चुनाव : पीएचई मंत्री क्षेत्र में सक्रिय नहीं : उनके प्रतिनिधियों की दिलचस्पी चखना सेंटर और ठेके लेने में, आम जनता की समस्याओं से कोई वास्ता नहीं 

द सीजी न्यूज डॉट कॉम

भिलाई-चरोदा नगर निगम चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच चुनाव प्रचार अभियान तेज हो गया है। हर हाल में निगम चुनाव जीतने के इरादे के साथ भाजपा ने अपने सबसे हुनरमंद चुनावी रणनीतिकार पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को यहां चुनाव की कमान सौंपी है। दूसरी ओर कांग्रेस सरकार के पीएचई मंत्री गुरु रूद्र कुमार का विधानसभा क्षेत्र होने के कारण यह सीट प्रतिष्ठा की सीट मानी जा रही है। इसी क्षेत्र में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का निवास भी है। इसी कारण कांग्रेस खेमा भी चुनावी जंग जीतने के अभियान में दिन-रात एक कर रहा है। चुनावी रणक्षेत्र में दोनों दलों के लिए कई चुनौतियां सामने खड़ी हैं।

पीएचई और ग्रामोद्योग विभाग का मंत्री होने के नाते गुरु रूद्र कुमार का अधिकांश समय रायपुर में ही बीतता है। क्षेत्र की जनता के बीच उनकी सक्रियता ना के बराबर है। विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि अहिवारा विधानसभा क्षेत्र में प्रवास के दौरान भी वे क्षेत्र की जनता के बीच नहीं जाते, बल्कि अपने प्रतिनिधियों और गिने-चुने कांग्रेस नेताओं से हमेशा घिरे रहते हैं। यही कारण है कि लोकप्रियता के पैमाने में गुरु रूद्र कुमार का ग्राफ घटा है।

इधर, विधायक व पीएचई मंत्री गुरु रूद्र कुमार के चंद सिपहसालारों की कारगुजारियां भी उनके लिए मुसीबत का कारण बन गई हैं। गुरु रूद्र कुमार के एक प्रतिनिधि का तो विधानसभा क्षेत्र में निवास भी नहीं है। इस प्रतिनिधि का निवास 20 किलोमीटर दूर है। पूरे एक विधानसभा क्षेत्र को पार कर दूसरे विधानसभा क्षेत्र में उनका निवास है। इनका वास्ता आम जनता की समस्याओं के समाधान से नहीं है, बल्कि विधानसभा क्षेत्र में आधा दर्जन चखना सेंटर चलाने और चहेते ठेकेदारों को पीएचई सहित अन्य विभागों के ठेके दिलाकर कमीशन वसूलने तक सीमित है। यानी दलाली का खुला खेल खेला जा रहा है। स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता उपेक्षित हैं। आम जनता की समस्याओं से इन प्रतिनिधि महाशय का कोई वास्ता नहीं। यही वजह है कि प्रदेश भर  में कांग्रेस के दबदबे के बावजूद भिलाई-चरोदा नगर निगम चुनाव में पार्टी के लिए मुश्किलें नजर आ रही है।

अब भाजपा की बात करें। नगर निगम के पिछले कार्यकाल में जनता ने भाजपा की महापौर चंद्रकांता मांडले को विजयी बनाया था। लेकिन, बाद में कांग्रेस ने रणनीति बनाकर निर्दलीय पार्षदों को अपने खेमे में मिलाकर सभापति का चुनाव जीत लिया। कांग्रेस के सभापति विजय जैन अपने कार्यकाल में प्रभावी रहे, लेकिन भाजपा की महापौर चंद्रकांता मांडले पूरे कार्यकाल के दौरान अपनी कार्यशैली को लेकर खास असर नहीं छोड़ने में विफल रही।

इन सारे तर्कों और मुद्दों के आधार पर कहा जा रहा है कि दोनों दलों के लिए मुश्किलें कम नहीं हैं। अलग-अलग मुद्दों के आधार पर कांग्रेस और भाजपा को चुनौतियां मिल रही हैं। सवालों के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। यही वजह है कि भिलाई चरौदा नगर निगम का चुनाव दोनों दलों के लिए आसान नहीं कहा जा रहा है … टक्कर कांटे की है …  

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