द सीजी न्यूज
छत्तीसगढ़ में चुनावी लड़ाई भले ही कांग्रेस-भाजपा के बीच हो रही हो, लेकिन असली जंग अडानी के विरुद्ध किसान, मजदूर, आदिवासी के बीच है। दरअसल, अडानी छत्तीसगढ़ के खनिज भंडार पर कब्जा जमाना चाहते हैं। नगरनार स्टील प्लांट पर भी अडानी की नजर है। सूत्र बता रहे हैं कि भिलाई स्टील प्लांट पर भी गिद्ध नजरें हैं।
अडानी के मिशन छत्तीसगढ़ में सबसे बड़ी रुकावट मुख्यमंत्री भूपेश बघेल हैं। भूपेश को हटाने में असफल रहने के बाद अब उन्हें हराने का मिशन शुरू किया गया है। इसके लिए सारे दांवपेंच आजमाए जा रहे हैं। सरकारी एजेंसियों का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है।
चुनावी गहमागहमी शुरू होने से पहले छत्तीसगढ़वासियों को यह अच्छी तरह समझ आ गया था कि भाजपा अगर राज्य की सत्ता में आती है तो पूरे प्रदेश की खनिज संपदा और बीएसपी, नगरनार जैसी सार्वजनिक कंपनियां अडानी के हाथों में चली जाएगी। बीते पांच साल में भूपेश बघेल ने ही अडानी को कोयला खदान देने का भी विरोध किया। वो भूपेश ही थे जिन्होंने नगरनार स्टील प्लांट बेचने के प्रयासों का पुरजोर विरोध किया। भूपेश के पुरजोर विरोध के कारण ही बीएसपी को निजी हाथों में सौंपने की केंद्र की तैयारियों को बड़ा झटका लगा।
केंद्र की मोदी सरकार ने बस्तर के नगरनार स्टील प्लांट को बेचने की तैयारी तीन-चार साल पहले ही कर ली थी। इसकी आहट मिलते ही सीएम भूपेश बघेल ने साफ तौर पर ऐलान कर दिया – नगरनार स्टील प्लांट को बिकने नहीं देंगे। अगर केंद्र सरकार ने इसे बेचने की कोशिश की तो राज्य सरकार प्लांट खरीदेगी। स्टील प्लांट को किसी भी हालत में प्राइवेट कंपनियों के हाथों में नहीं जाने दिया जाएगा। भूपेश ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए विधानसभा में इस संबंध में बाकायदा प्रस्ताव भी पारित कराया।
सीएम भूपेश के इस ऐलान के बाद से ही भाजपा (पर्दे के पीछे अडानी) ने भूपेश की घेरेबंदी शुरू कर दी। फिर अचानक छत्तीसगढ़ में ईडी, आईटी, सीबीआई के छापे पड़ने लगे। सीएम भूपेश बघेल के करीबियों को एक-एक कर गिरफ्तार किया जाने लगा। शिकंजा कसने की कवायद लगातार चल रही है। चुनाव का पहला चरण होने के बाद भी ये कोशिशें थमी नहीं हैं। निशाने पर सिर्फ और सिर्फ भूपेश बघेल हैं।
मकसद सिर्फ एक है – भूपेश को सत्ता में वापस आने से रोकना … ताकि, अपने मित्रों को नगरनार स्टील प्लांट बेचा जा सके। भिलाई स्टील प्लांट को एकमुश्त या किश्तों में मित्रों को बेचा जा सके। राज्य के खनिज भंडार पर भी भाजपा के उद्योगपति मित्रों का कब्जा हो सके। राजनीतिक हलकों में इस बात की भारीभरकम तरीके से चर्चा हो रही है कि भूपेश की सरकार बनने से रोकने के लिए ही भाजपा ने ईडी, सीबीआई, आईटी का सहारा ले रही है।
भूपेश बघेल की सरकार ने छत्तीसगढ़ के किसानों का कर्ज माफ किया। फसल की अच्छी कीमत दी। आदिवासियों से बेहतर मूल्य पर वनोपज की खरीदी की, उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर बनाने की दिशा में उल्लेखनीय काम किया। शिक्षित बेरोजगार युवाओं को ढाई हजार रुपए महीना भत्ता देने के साथ ही मजदूरों को 10 हजार रुपए सालाना दिया। महिलाओं को स्वरोजगार देकर आत्मनिर्भर बनाया। हर वर्ग के कल्याण के लिए योजनाएं बनाई। नतीजतन,,, पांच साल में छत्तीसगढ़वासियों के चहेते बन गए हैं भूपेश।
यही वजह है कि कांग्रेस, भाजपा की चुनावी लड़ाई में भूपेश का साथ छत्तीसगढ़ के किसान भी दे रहे हैं और आदिवासी, युवा, महिलाएं भी…। 7 नवंबर को 20 सीटों पर हुए पहले चरण के मतदान के दौरान छत्तीसगढ़वासियों की अडानी के खिलाफ चल रही लड़ाई के नतीजों के संकेत भी मिलने लगे। बीजापुर-सुकमा, कोंटा से लेकर पंडरिया-कवर्धा तक मतदान के दौरान हर तरफ सिर्फ कका की लहर दिखाई दी।
पांच साल पहले भी रमन समेत भाजपा नेताओं ने देखा था हसीन सपना … हुआ एकदम उलटा
पिछले विधानसभा चुनाव में तत्कालीन सीएम डॉ रमन सिंह, बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, सरोज पांडेय व अन्य भाजपा नेताओं ने 65 प्लस सीटें जीतने का दावा किया था। लेकिन हुआ एकदम उलटा। 65 प्लस (68 सीटों) पर कांग्रेस जीती।
इस बार 20 सीटों पर पहले चरण के मतदान के बाद रमन समेत सभी भाजपा नेता 20 में से 18-19 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं। मतदान के रुझान बता रहे कि इन दावों से एकदम उलटा होना तय है। 2018 की तरह। राजनीतिक विश्लेषकों को उम्मीद है कि कांग्रेस 20 में से 17 से 19 सीटें तक जीत सकती है।
नतीजों के लिए 3 दिसंबर तक इंतजार करना होगा।
और हां … तब तक … 2018 की तरह मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने वाले इस बार भी वही सपने देख सकते हैं।
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