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दुर्ग। कल गनियारी के सरकारी स्कूल की छत का प्लास्टर गिरा और तीन बच्चे घायल हो गए। एक बेटी के सिर पर तीन टांके लगे। दो अन्य बच्चों को भी चोट लगी। बस … ज्यादा कुछ नहीं हुआ।
सरकार और सरकारी सिस्टम के लिये यह मामूली घटना है …
तीन बच्चे ही तो घायल हुए हैं …
सिर पर ही तो चोट लगी है … ।
हाय तौबा मचाने की कोई जरूरत नहीं …
सिस्टम ने घटना की जांच के लिये टीम भेज दी है। जांच रिपोर्ट बनेगी। फिर कई हफ्ते बाद प्रस्ताव बनेगा। फिर कुछ महीने या साल बाद जीर्णोद्धार या मेंटेनेंस वगैरह होगा।
सरकार का सिस्टम वैसे ही काम कर रहा है, जैसे अब तक करता आया है। बेपरवाह … बेदर्द और नाकारा सिस्टम … ऐसे ही काम करते रहेगा …
जानकारी के अनुसार अप्रैल 2025 में दुर्ग जिले के शिक्षा विभाग के दफ्तर से एक प्रस्ताव राजधानी भेजा गया था। जिले के 340 खस्ताहाल स्कूलों की मरम्मत या ढहाने लायक भवन को गिरा देने के लिये कुल साढ़े 17 करोड़ रुपए की मांग की गई थी।
कोई बताएगा कि करीब डेढ़ साल बाद कितने स्कूलों की मरम्मत हुई ? कितने जर्जर स्कूलों के कितने भवन गिरे ?
बड़ा सवाल ये है कि
सरकार ने राशि स्वीकृत करने में इतने महीने क्यों लगा दिये ?
क्या विष्णुदेव साय सरकार को बच्चों की जान की परवाह नहीं है ???
सवाल ये भी है कि जब 340 स्कूलों का प्रस्ताव भेजा गया तो – स्कूलों के लिये ही क्यों मंजूरी मिली ??
क्या विष्णुदेव साय सरकार को बाकी स्कूलों के बच्चों के प्राणों की फिक्र नहीं है???
सवाल ये भी बनता है कि आखिर … किस गहरी नींद में सो रही है विष्णुदेव साय सरकार ??
लाखों बच्चे अपना भविष्य गढ़ने ऐसे ही जर्जर और खस्ताहाल स्कूलों में पढ़ रहे हैं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता अरुण वोरा एक बड़ा सवाल उठाते हैं …
बच्चे पढ़ें या अपनी जान बचाएं ???
सवाल का जवाब सुशासन सरकार यानी … डबल – ट्रपल इंजिन सरकार के पास नहीं है। क्योंकि इंजिन शायद खटारा हो चुका है। ऐसे खटारा इंजिन से उम्मीद नहीं बची …
इसलिये हे ईश्वर …
रहम करना … इन मासूमों की रक्षा करना ,,,
पढ़ने और भविष्य गढ़ने के लिये स्कूल जाने वाले विद्यार्थियों की रक्षा करना …
क्योंकि ये नहीं जानते कि पढ़ते-पढ़ते कब उनके सिर पर प्लास्टर का टुकड़ा गिर जाएगा और … हादसा हो जाए …
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