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दुर्ग में कांग्रेस के चुनाव अभियान का शीराजा बिखरा … सधे कदमों से मजबूती से चल रहा है भाजपा का चुनाव अभियान

द सीजी न्यूज

दुर्ग में कांग्रेस और भाजपा के बीच विधानसभा चुनाव की लड़ाई शुरू हो गई है। कांग्रेस प्रत्याशी अरुण वोरा और भाजपा प्रत्याशी गजेंद्र यादव के समर्थक उत्साहित होकर चुनावी तैयारियों में जुट गए हैं। दोनों दलों में भरोसे की कमी, अविश्वास और होने वाले घात-प्रतिघात को लेकर धुंध साफ नहीं हुई है। दोनों दलों की पूरी टीम अभी तक पूरी ताकत के साथ सामने नहीं आई है। राजनीतिक रिश्ते कुछ हद तक अभी भी उलझे हैं। प्रत्याशी को खुला समर्थन देने या खुलाघात व भीतरघात की तस्वीर साफ नहीं हुई है।

विधायक अरुण वोरा के चुनाव अभियान का शीराजा ( प्रबंधन या एक सूत्र में बांधने वाली ताकत ) बिखरा-बिखरा सा है। लापरवाही का आलम यह कि गुरुवार तक कई वार्डों के बूथ कमेटी और सेक्टर कमेटी के गठन का काम ही अधूरा था। प्रचार अभियान के लिए होर्डिंग्स व अन्य प्रचार माध्यम के लिए प्रारंभिक तैयारियां ही नहीं हुई थी। कांग्रेस प्रत्याशी अरुण वोरा गिनती के युवा कार्यकर्ताओं से घिरे हैं। न तो चुनावी रणनीति बन रही है, न चुनाव अभियान की तैयारी हो रही है।

कांग्रेस ने दुर्ग के लिए चुनाव प्रभारी इरफान खान को बनाया है। लेकिन, उन्हें न तो दुर्ग में चुनावी तैयारी के लिए बुलाया जा रहा है, न वो खुद आ रहे हैं। हालत ये है कि शहर कांग्रेस अध्यक्ष गया पटेल, पूर्व महापौर आरएन वर्मा, निगम सभापति राजेश यादव सहित शहर में सक्रिय रहने वाले कांग्रेस संगठन के कई नामी चेहरे पॉलिटिकल सीन से लगभग गायब हैं। कांग्रेस के अधिकांश पार्षदों और संगठन नेताओं पर भरोसा ही नहीं किया जा रहा है। गुटों में बंटे शहर कांग्रेस के नेता बेमन से काम कर रहे हैं। ज्यादातर लोग गुड बुक में आने की होड़ में शामिल हैं। पार्टी का काम करने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है।   

हर बार की तरह इस बार भी शानू वोरा ( विधायक अरुण वोरा के चचेरे भाई ) चुनावी रणनीति बना रहे हैं। ब्लाक स्तर के जिम्मेदार पदाधिकारियों की बैठकें भी नियमित रूप से ले रहे हैं। लेकिन कांग्रेस कैंप में एक दूसरे पर अविश्वास, किसी को नीचे गिराने और किसी को ऊपर उठाने का खेल ज्यादा हो रहा है। फूट डालकर एक दूसरे को लड़ाने की राजनीति ज्यादा हो रही है। चुनाव अभियान को लेकर हो रही बैठकों से संगठन के ज्यादातर नेता गायब हैं। उन पर भरोसा ही नहीं किया जा रहा है।

सबसे बड़ी बात ये है कि कांग्रेस कैंप की सबसे बड़ी ताकत दिग्गज कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा का मार्गदर्शन इस चुनाव में वोरा को नहीं मिल रहा है। उनकी नसीहत नहीं मिल रही है। बाबूजी ने जो नसीहत दी, उस पर अमल भी नहीं किया जा रहा है।

बाबू जी ऐसी ताकत रहे जिनकी मौजूदगी मात्र से कांग्रेस प्रत्याशी अरुण वोरा का चुनाव अभियान बेहद आसान हो जाता था। आपसी खींचतान, गुटबाजी, नाराजगी जैसी समस्याएं बाबूजी की उपस्थिति मात्र से ही खत्म हो जाती थी। लेकिन, इस बार बाबूजी की विराट ताकत के बिना अरुण वोरा चुनाव लड़ रहे हैं। सो, चुनावी राह आसान नहीं है, यह समझना जरूरी है, लेकिन कोई समझने को तैयार नहीं है। 

मोतीलाल वोरा हमेशा कांग्रेस कार्यकर्ताओं और संगठन पदाधिकारियों को फील्ड यानी वार्ड में रहकर कांग्नेस की कमान संभालने की नसीहत देते थे। लेकिन, इस चुनाव में बाबूजी की नसीहत पर अमल होता नहीं दिख रहा है।

प्रत्याशी अरुण वोरा के इर्द गिर्द हम तो जीत रहे हैं  जैसी जुमलेबाजी करने वाले चापलूसों की संख्या ज्यादा है।

फील्ड में काम हो रहा है या नहीं हो रहा है, इसकी परवाह किसी को नहीं है।

शानू वोरा अभी तक बूथ कमेटी और सेक्टर कमेटी के गठन की रिपोर्ट लेने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाए हैं। 

पूरे देश की जनता जुमलेबाजी से परेशान है। लेकिन, वोरा को अपने समर्थकों की जुमलेबाजी से परेशानी नहीं हैं।

जुमलेबाजी से खुश हो रहे हैं वोरा। 

कांग्रेस नेता भूल रहे हैं कि अति आत्मविश्वास की पराकाष्ठा अक्सर शिकस्त का कारण बन जाती है। 

दुर्ग में कांग्रेस में यही सब हो रहा है। भाजपा सधे कदमों से आगे बढ़ रही है। कांग्रेस में जो ग्रास रूट के काम अभी तक नहीं हो पाए हैं, भाजपा वो सभी काम टीम वर्क से पूरा कर चुकी है। अलग अलग टीमें अलग अलग काम कर रही हैं। प्रत्याशी गजेंद्र यादव वार्डों में निकल चुके हैं।

हाल ये है कि कांग्रेस कैंप में अभी तक प्रत्याशी के वार्ड भ्रमण का दौरा कार्यक्रम भी तैयार नहीं हो पाया है।                                 

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