द सीजी न्यूज
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अरुण वोरा ने केंद्रीय बजट 2026 को लेकर भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है।उन्होंने कहा कि यह बजट विकास का दस्तावेज़ कम और शब्दों की बाज़ीगरी ज़्यादा है। यह बजट न युवाओं का है, न किसानों का, न मध्यम वर्ग का। यह बजट शब्दों का शोर है—ऊँची दुकान, फीका पकवान। कर्तव्य की बात करने वाली सरकार ने देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाना छोड़ दिया है।”
प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना को लेकर अरुण वोरा ने गंभीर आंकड़े सामने रखे।उन्होंने बताया कि जिस योजना के लिए 10,830 करोड़ रुपये का एलान हुआ था, वह रिवाइज्ड एस्टीमेट में घटकर 526 करोड़ रुपये रह गई—यानी लगभग 95% कटौती।“युवाओं को भविष्य के सपने दिखाए गए, लेकिन बजट आते-आते सरकार खुद उस योजना से पीछे हट गई।”उन्होंने यह भी कहा कि जिन कंपनियों ने इंटर्नशिप ऑफर दिए, उनमें से बड़ी संख्या में युवाओं ने ऑफर स्वीकार ही नहीं किए और कई ने बीच में ही इंटर्नशिप छोड़ दी।“यह आंकड़े सरकार के दावों की सच्चाई खुद बयां करते हैं।”
उन्होंने कहा,“अमृत सरोवर योजना की घोषणा 2020 में बड़े-बड़े दावों के साथ की गई थी। कहा गया था कि हर जिले में तालाबों का कायाकल्प होगा, किसानों को पानी मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। लेकिन 2026 आ गया—तालाब सूखे हैं, किसान परेशान हैं और सरकार के पास ज़मीनी नतीजों का कोई हिसाब नहीं है।”उन्होंने कहा, “अमृत सरोवर योजना की घोषणा 2020 में बड़े-बड़े दावों के साथ की गई थी। कहा गया था कि हर जिले में तालाबों का कायाकल्प होगा, किसानों को पानी मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। लेकिन 2026 आ गया—तालाब सूखे हैं, किसान परेशान हैं और सरकार के पास ज़मीनी नतीजों का कोई हिसाब नहीं है।”
अरुण वोरा ने सवाल उठाया कि अगर पिछले छह वर्षों में अमृत सरोवर जैसी योजनाएं सच में सफल होतीं, तो सरकार को आज बजट 2026 में नए जुमलों की जरूरत ही नहीं पड़ती।“कागज़ों में गांव चमक रहे हैं, लेकिन ज़मीन पर किसान आज भी पानी, सिंचाई और आय के लिए संघर्ष कर रहा है। यही भाजपा सरकार के बजट की सच्चाई है।”
अरुण वोरा ने कहा कि केंद्रीय बजट 2026 की सबसे बड़ी चूक यह है कि इसमें मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसे बहुप्रचारित अभियानों का नाम तक नहीं लिया गया।उन्होंने कहा,
“जिन योजनाओं को देश की औद्योगिक रीढ़ बताया गया था, वे आज सरकार के बजट भाषण से ही गायब हैं—यह अपने आप में उनकी विफलता की स्वीकारोक्ति है।”आंकड़ों का हवाला देते हुए अरुण वोरा ने बताया कि वर्ष 2006–07 में देश की GDP में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान 19% था, जो आज घटकर महज़ 14% रह गया है।“12 साल तक सत्ता में रहने के बावजूद अगर मैन्युफैक्चरिंग पीछे जा रही है, तो यह प्रगति नहीं, नीति की असफलता है।”उन्होंने कहा कि आज भारत मैन्युफैक्चरिंग के मामले में एशिया में छठे स्थान पर है, जबकि सरकार हर बजट में चीन को चुनौती देने की बातें करती रही है।“अगर भारत सच में औद्योगिक शक्ति बन रहा होता, तो न तो आंकड़े गिरते और न ही हमारी वैश्विक रैंकिंग।”अरुण वोरा ने स्पष्ट कहा कि यह बजट मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को नई दिशा देने में नाकाम रहा है और रोजगार सृजन के बड़े दावों की पोल खोलता है।
महंगाई लगातार आम आदमी की कमर तोड़ रही है।“सोना और चांदी जैसी पारंपरिक बचत और जरूरत की चीजें आज आम नागरिक की पहुंच से बाहर हो चुकी हैं। रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन सरकार के पास इससे निपटने की कोई ठोस योजना नहीं है।” 2025 में भारतीय रुपया पूरे एशिया में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्रा रहा।“कमजोर रुपया सीधे महंगाई बढ़ाता है, आयात महंगा करता है और आम नागरिक पर बोझ डालता है, लेकिन बजट 2026 में इस गंभीर स्थिति को संभालने के लिए कोई स्पष्ट रणनीति नजर नहीं आती।”
अरुण वोरा ने शेयर बाजार की स्थिति का ज़िक्र करते हुए कहा,“कहावत है कि रविवार को शेयर बाजार नुकसान नहीं देता, लेकिन इस बार वह कहावत भी टूट गई। बजट के बाद सेंसेक्स करीब 1000 अंक तक गिर गया और लगभग 8 लाख करोड़ रुपये की बाजार पूंजी हवा हो गई। यह निवेशकों के भरोसे पर सीधा आघात है”।
अरुण वोरा ने साफ शब्दों में कहा, “यह बजट न युवाओं का है, न किसानों का, न मध्यम वर्ग का। यह बजट शब्दों का शोर है—ऊँची दुकान, फीका पकवान। कर्तव्य की बात करने वाली सरकार ने देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाना छोड़ दिया है।”
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